रतलाम / सैलाना। इंदिरागांधी बस स्टैंड स्थित सुलभ कॉम्प्लेक्स के बाहर दुकान क्रमांक 44 से 58 तक की 15 दुकानों को लेकर चल रहे विवाद में 22 अगस्त 2026 को न्यायालय के महत्वपूर्ण आदेश के बाद नगर परिषद सैलाना को बड़ी कानूनी राहत मिली है। प्रथम व्यवहार न्यायाधीश वरिष्ठ खंड, सैलाना श्री तथागत याग्निक के न्यायालय ने दुकानदारों द्वारा दायर अस्थायी निषेधाज्ञा का आवेदन निरस्त कर दिया। इस आदेश के बाद नगर परिषद द्वारा जर्जर दुकानों को हटाकर नए निर्माण की प्रस्तावित योजना के सामने लगी अस्थायी कानूनी अड़चन फिलहाल दूर हो गई है।
यह मामला RCS A No.37/2026, Filing No.55/2026 और CNR No.MP43060008692026 से संबंधित है। मामले में सुशीला पति नंदकिशोर बोराना, सुभद्रा पति गेंदालाल जैन, शांतिबाई पति बसंतीलाल चौहान, रमेशचंद्र पिता भुवान बाफना जैन, अनिल पिता शांतिलाल माण्डोत जैन, रितेश पिता शांतिलाल माण्डोत जैन, राजेन्द्रसिंह पिता रामचंद्र जाट, नाथु पिता रामसिंह ग्वाले और संजय पिता जगदीश बोराना वादीगण हैं।
प्रतिवादी पक्ष में मुख्य नगर पालिका अधिकारी नगर परिषद सैलाना, अध्यक्ष नगर परिषद सैलाना, अनुविभागीय अधिकारी लोक निर्माण विभाग उपखंड सैलाना तथा सुलभ इंटरनेशनल सामाजिक सेवा संस्था के ए.एम. एवं कंट्रोलर अनिल कुमार झा शामिल हैं।
नगर परिषद के रुख को मिली न्यायिक मजबूती
दुकानों को लेकर नगर परिषद का कहना रहा है कि संबंधित भवन काफी समय से जीर्ण-शीर्ण अवस्था में हैं और इनकी स्थिति को देखते हुए सुरक्षा की दृष्टि से नया निर्माण आवश्यक है। परिषद ने न्यायालय में यह भी स्पष्ट किया कि प्रस्तावित कार्रवाई का उद्देश्य दुकानदारों को नुकसान पहुंचाना नहीं, बल्कि जर्जर संरचना को हटाकर बेहतर और सुरक्षित व्यवस्था तैयार करना है।
नगर परिषद की ओर से यह महत्वपूर्ण पक्ष भी रखा गया कि वर्तमान दुकानों के पुनर्निर्माण के बाद पूर्व आवंटित दुकानदारों को ही नई दुकानें उपलब्ध कराने की योजना है। यानी विवाद का उद्देश्य दुकानदारों को उनके व्यवसाय से हमेशा के लिए वंचित करना नहीं, बल्कि जर्जर दुकानों के स्थान पर नई एवं व्यवस्थित दुकानों का निर्माण करना बताया गया है।
सिंहस्थ और बस स्टैंड विस्तार भी बना अहम आधार
नगर परिषद ने आगामी उज्जैन सिंहस्थ को देखते हुए सैलाना बस स्टैंड के विस्तार और चौड़ीकरण की आवश्यकता का भी उल्लेख किया। बस स्टैंड पर स्थानीय नागरिकों के साथ बड़ी संख्या में आने वाले यात्रियों और दर्शनार्थियों की सुविधा को देखते हुए बेहतर एवं सुरक्षित सार्वजनिक व्यवस्था विकसित करना परिषद की योजना का हिस्सा बताया गया।
न्यायालय ने अपने आदेश में नगर परिषद द्वारा प्रस्तुत इन तथ्यों और दस्तावेजों पर विचार किया। न्यायालय ने माना कि परिषद द्वारा दुकानों को तोड़कर नवीन दुकानों के निर्माण के लिए प्रशासकीय स्वीकृति ली गई है तथा दुकानदारों को संबंधित सूचना भी दी गई थी
30 साल से कारोबार, दुकानें ही जीविका का आधार बताया
वादी पक्ष ने न्यायालय में बताया कि संबंधित दुकानों में करीब 30 वर्षों से व्यापार किया जा रहा है और दुकानदारों के परिवारों की आजीविका इन्हीं दुकानों पर निर्भर है। दुकानदारों ने नगर परिषद के संकल्प क्रमांक 33 को चुनौती देते हुए कहा कि दुकानों को जर्जर बताकर उन्हें तोड़ने की तैयारी की जा रही है। उनके अनुसार नगर परिषद ने दुकानों को तोड़कर पुनर्निर्माण करने की योजना बनाई है और उन्होंने अस्थायी निषेधाज्ञा के माध्यम से कार्रवाई रोकने की मांग की थी।
नगर परिषद की ओर से न्यायालय में इसका विरोध किया गया।
परिषद ने बताया कि दुकानें जीर्ण-शीर्ण अवस्था में हैं और उनकी स्थिति को देखते हुए उन्हें हटाकर नवीन दुकानों का निर्माण किया जाना प्रस्तावित है। परिषद के अनुसार निर्माण के बाद पूर्व आवंटित दुकानदारों को ही दुकानें पुनः आवंटित किए जाने का निर्णय है।
नगर परिषद ने यह भी पक्ष रखा कि आगामी उज्जैन सिंहस्थ को देखते हुए सैलाना बस स्टैंड के विस्तार और स्थानीय नागरिकों तथा आने वाले दर्शनार्थियों की सुविधा के लिए आवश्यक विकास कार्य किए जाने हैं। जर्जर दुकानों के कारण जनहानि की संभावना को भी परिषद ने कार्रवाई का प्रमुख आधार बताया।
कोर्ट ने तीनों अहम बिंदुओं पर दुकानदारों का दावा नहीं माना
न्यायालय ने आदेश में अस्थायी निषेधाज्ञा के लिए तीन प्रमुख बिंदुओं—प्रथमदृष्टया मामला, अपूर्णनीय क्षति और सुविधा का संतुलन—पर विस्तार से विचार किया।
न्यायालय ने पाया कि नगर परिषद द्वारा दुकानों को तोड़कर नवीन दुकानों के निर्माण के लिए प्रशासकीय स्वीकृति ली गई है तथा दुकानदारों को सूचना भी दी गई थी। न्यायालय ने यह भी उल्लेख किया कि प्रतिवादी पक्ष के अनुसार जर्जर दुकानों को तोड़ने के बाद पूर्व आवंटनधारियों को ही नई दुकानें दी जानी हैं।
आदेश में न्यायालय ने विशिष्ट अनुतोष अधिनियम की धारा 41 में किए गए संशोधन का भी उल्लेख किया और कहा कि यदि किसी सरकारी परियोजना अथवा विस्तार कार्य की प्रगति में निषेधाज्ञा से बाधा उत्पन्न होती है तो ऐसे मामलों में व्यादेश प्रदान नहीं किया जा सकता।
जनहानि और बस स्टैंड विस्तार का भी उल्लेख
न्यायालय के आदेश में नगर परिषद के उन कारणों का भी उल्लेख है जिनके आधार पर दुकानों को हटाने की कार्रवाई की जा रही है। इनमें दुकानों की जर्जर स्थिति के कारण जनहानि की आशंका तथा भविष्य में सिंहस्थ आयोजन को देखते हुए बस स्टैंड के विस्तार और चौड़ीकरण की आवश्यकता प्रमुख है।
न्यायालय ने यह भी माना कि यदि दुकानों को तोड़ने के बाद पूर्व आवंटित दुकानदारों को पुनः दुकानें उपलब्ध कराने की बात प्रतिवादी पक्ष ने कही है तो केवल दुकान टूटने के आधार पर अपूर्णनीय क्षति का दावा पर्याप्त नहीं माना जा सकता।
अस्थायी निषेधाज्ञा आवेदन खारिज
सभी तथ्यों और दस्तावेजों के परीक्षण के बाद न्यायालय ने स्पष्ट निष्कर्ष दिया कि वादीगण अपने पक्ष में अस्थायी निषेधाज्ञा के लिए आवश्यक तीनों आधार साबित नहीं कर सके। इसके चलते आई.ए. क्रमांक 2/26 के तहत प्रस्तुत अस्थायी निषेधाज्ञा आवेदन निरस्त कर दिया गया।
हालांकि न्यायालय ने अपने आदेश में यह भी स्पष्ट किया है कि इस आदेश का मूल वाद के गुण-दोष पर कोई प्रभाव नहीं होगा। अर्थात मुख्य प्रकरण में पक्षकारों के अधिकारों और अन्य मुद्दों पर आगे न्यायिक प्रक्रिया जारी रहेगी।
अब आगे क्या होगा?
22 अगस्त को जारी इस आदेश के बाद सैलाना बस स्टैंड की इन दुकानों को लेकर नगर परिषद और दुकानदारों के बीच चल रहे विवाद में एक महत्वपूर्ण न्यायिक पड़ाव सामने आया है। फिलहाल अदालत ने दुकानदारों की ओर से मांगी गई अस्थायी रोक को स्वीकार नहीं किया है। ऐसे में नगर परिषद की प्रस्तावित कार्रवाई को लेकर अब आगे की प्रशासनिक एवं न्यायालयीन प्रक्रिया पर सबकी नजर रहेगी।
यह पूरा मामला सैलाना में इसलिए भी चर्चा में है क्योंकि एक तरफ दुकानदार करीब तीन दशक से दुकानों में कारोबार और अपनी आजीविका का हवाला दे रहे हैं, वहीं नगर परिषद जर्जर भवन, संभावित जनहानि और सिंहस्थ को ध्यान में रखते हुए बस स्टैंड विस्तार को आधार बनाकर पुनर्निर्माण की दिशा में आगे बढ़ना चाहती है। अब इस विवाद का अंतिम स्वरूप मुख्य वाद के आगामी न्यायालयीन निर्णय और संबंधित प्रशासनिक कार्रवाई से तय होगा।
रिपोर्टर जितेन्द्र कुमावत