रतलाम / सैलाना। परम पूज्य दीर्घ संयमी साध्वीवर्या श्री चारुदर्शा श्रीजी म.सा. के 06 सितंबर 2026 रविवार को अहमदाबाद में उपचार के दौरान समाधि पूर्वक देवलोकगमन (कालधर्म) से समूचा जैन समाज शोकाकुल हो गया। साध्वीश्री वर्ष 2026 के पावन चातुर्मास के लिए सैलाना में विराजित थीं। करीब आठ दिन पूर्व स्वास्थ्य बिगड़ने पर समाजजनों द्वारा स्थानीय चिकित्सकों की सलाह से उन्हें विशेष उपचार के लिए अहमदाबाद ले जाया गया था, जहां इलाज के दौरान उनका कालधर्म हो गया।
साध्वीश्री की पावन देह को अहमदाबाद से ससम्मान सैलाना लाया गया। सोमवार को सैलाना के छोटा जैन मंदिर से दोपहर करीब 1:30 बजे धार्मिक विधि-विधान के साथ उनकी अंतिम डोल एवं पालकी यात्रा निकाली गई। अंतिम यात्रा में बड़ी संख्या में जैन समाज सहित सर्वसमाज के लोग शामिल हुए। नगर के प्रमुख मार्गों से निकली यात्रा में श्रद्धालु नवकार मंत्र, धार्मिक जयघोष और गुरु भक्ति के उद्घोष करते हुए चल रहे थे। पूरा सैलाना धर्ममय और भक्तिमय वातावरण में डूबा नजर आया।
सकल जैन समाज ने व्यवसाय और प्रतिष्ठान बंद रखकर अंतिम यात्रा में सहभागिता की। साध्वीश्री के प्रति समाजजनों की श्रद्धा और सम्मान का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि अंतिम दर्शन एवं विदाई के लिए बड़ी संख्या में श्रद्धालु उमड़े। नम आंखों से समाजजनों ने अपनी पूज्य साध्वीश्री को अंतिम विदाई दी।
पालकी यात्रा के मुक्तिधाम पहुंचने के बाद धार्मिक रीति-रिवाज एवं विधि-विधान के अनुसार परिवारजनों द्वारा साध्वीश्री का अंतिम संस्कार संपन्न किया गया। इस दौरान जिनशासन के जयकारों और नवकार मंत्र के मंगल उच्चारण से वातावरण भावविभोर हो गया।
19 बोलियों में लाखों की श्रद्धा अर्पित
जैन श्वेतांबर मूर्ति पूजा श्री संघ के अध्यक्ष सुरेंद्र मेहता एवं चातुर्मास समिति अध्यक्ष प्रियंक चंडालिया द्वारा अंतिम यात्रा से संबंधित बोलियों की जानकारी दी गई। साध्वीश्री के प्रति श्रद्धा व्यक्त करते हुए विभिन्न धार्मिक लाभों के लिए समाजजनों एवं श्रद्धालुओं ने बढ़-चढ़कर बोलियां लगाईं।
इनमें सबसे प्रमुख आगे का दायां कंधा ₹1,51,000 की बोली श्री उच्छवलालजी दलाल परिवार, उज्जैन द्वारा लगाई गई। वहीं आगे का बायां कंधा ₹1,11,000 की बोली श्री तपागच्छ जैन संघ सिणधरी (नाकोड़ा) ने ली।
मुख्य कलश ₹1,08,000 तथा पालकी में विराजमान करने का लाभ ₹1,08,000 की बोली भी श्रद्धालुओं द्वारा ली गई। मुख्य कलश एवं आगे का दायां कंधा सहित कई महत्वपूर्ण धार्मिक लाभ उज्जैन के उच्छवलालजी दलाल परिवार ने लिए, हस्ते नरेन्द्रकुमारजी, महेन्द्रकुमारजी तरसिंग।
इसके अतिरिक्त पीछे का दायां कंधा ₹72,000, पीछे का बायां कंधा ₹61,000, ऊपर के कलशों के लिए ₹61,000, ₹51,000, ₹51,000 एवं ₹41,000 की बोलियां लगीं। मशाल के लिए ₹31,000 और ₹41,000, कागमली वोहराने का लाभ ₹45,000 तथा केसर स्वस्तिक एवं आसन बिछाने का लाभ ₹61,000 में लिया गया।
लड्डू अनुकम्पा दान (वितरण) ₹27,000, वर्षीदान ₹31,000 तथा आगे का धूपिया ₹31,000 की बोली भी लगी।
दी गई बोली सूची के अनुसार सभी 19 बोलियों की कुल राशि ₹11,38,225 (ग्यारह लाख अड़तीस हजार दो सौ पच्चीस रुपये) इकट्ठी हुई ।
1978 में ली थी दीक्षा, 48 वर्ष का संयम जीवन
साध्वीवर्या श्री चारुदर्शा श्रीजी म.सा. गच्छाधिपति आचार्य भगवंत श्री नरदेवसागर सूरीश्वरजी महाराज साहब की आज्ञावर्तनी एवं दीर्घ संयमी साध्वीवर्या श्री हेमेंद्र श्रीजी म.सा. की सुशिष्या थीं। वे स्वयं साध्वी श्री कल्पिता श्रीजी म.सा. एवं साध्वी श्री चारुताश्रीजी म.सा. की गुरुवर्या थीं।
सरल, सौम्य, शांत, सादगीपूर्ण एवं अनेक गुणों से परिपूर्ण साध्वीश्री ने अपना संपूर्ण जीवन जिनशासन की प्रभावना, तप, स्वाध्याय और संयम को समर्पित किया। उन्होंने सन 1978 में दीक्षा ग्रहण की थी और उनके दीक्षा जीवन के 48 वर्ष पूर्ण हो चुके थे।
साध्वीश्री उज्जैन की थीं। वे स्व. उच्छबलाल जी तरसिंग की सांसारिक पुत्री तथा श्री नरेंद्र जी एवं श्री महेंद्र जी तरसिंग, कपड़ा दलाल, उज्जैन की सांसारिक बहन थीं।
सैलाना में चातुर्मास के दौरान बिगड़ी थी तबीयत
वर्ष 2026 का पावन चातुर्मास सैलाना, मालवा क्षेत्र में चल रहा था। चातुर्मास के दौरान स्वास्थ्य अत्यधिक बिगड़ने पर उन्हें अहमदाबाद में विशेष चिकित्सा एवं उपचार के लिए ले जाया गया, जहां 06 सितंबर 2026 को उपचार के दौरान उनका देवलोकगमन हुआ।
उनके कालधर्म का समाचार मिलते ही सैलाना सहित आसपास के क्षेत्रों और जैन समाज में शोक की लहर दौड़ गई। अंतिम यात्रा में उमड़ा जनसैलाब साध्वीश्री के प्रति समाज की गहरी श्रद्धा और उनके संयममय जीवन के प्रति सम्मान का प्रमाण रहा।
साध्वीश्री का जीवन तप, त्याग, साधना, स्वाध्याय, संयम और जिनशासन की सेवा को समर्पित रहा। उनके शांत एवं स्नेहपूर्ण व्यक्तित्व को स्मरण करते हुए समाजजनों ने भावपूर्ण श्रद्धांजलि अर्पित की।
रिपोर्टर जितेन्द्र कुमावत