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नई दिल्ली। भारत की अर्थव्यवस्था लगातार विस्तार कर रही है, लेकिन इसके साथ ही देश पर सरकारी कर्ज का बोझ भी तेजी से बढ़ा है। हाल ही में सामने आए आर्थिक आंकड़ों के अनुसार, केंद्र सरकार का कुल कर्ज पिछले एक दशक में रिकॉर्ड स्तर तक पहुंच गया है। जानकारी के मुताबिक वर्ष 2014 में केंद्र सरकार पर कुल कर्ज लगभग 55 से 60 लाख करोड़ रुपये के बीच था, जो अब 2025-26 तक बढ़कर करीब 190 से 200 लाख करोड़ रुपये के आसपास पहुंचने का अनुमान है। इस तरह कुल राशि के हिसाब से सबसे ज्यादा कर्ज वृद्धि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के कार्यकाल में दर्ज की गई है। हालांकि आर्थिक विशेषज्ञों का कहना है कि केवल कुल कर्ज को देखकर स्थिति का आकलन करना सही नहीं होगा। पिछले वर्षों में देश की जीडीपी में भी बड़ा विस्तार हुआ है और केंद्र सरकार ने हाईवे, रेलवे, एयरपोर्ट, रक्षा, डिजिटल इंफ्रास्ट्रक्चर और जनकल्याण योजनाओं पर भारी निवेश किया है। विशेषज्ञ यह भी मानते हैं कि कोविड-19 महामारी के दौरान देश की अर्थव्यवस्था को संभालने, गरीबों को राहत देने और स्वास्थ्य सुविधाओं को मजबूत करने के लिए सरकार को बड़े पैमाने पर उधारी लेनी पड़ी थी। इसी कारण दुनिया के कई देशों की तरह भारत का सरकारी कर्ज भी तेजी से बढ़ा। आर्थिक विश्लेषकों के अनुसार किसी भी देश की वित्तीय स्थिति को समझने के लिए केवल कर्ज की कुल राशि नहीं, बल्कि Debt-to-GDP Ratio यानी देश की अर्थव्यवस्था के मुकाबले कर्ज कितना है, यह ज्यादा महत्वपूर्ण माना जाता है। कोविड काल में यह अनुपात बढ़ा जरूर था, लेकिन बाद के वर्षों में इसमें कुछ सुधार भी देखने को मिला है। फिलहाल बढ़ते सरकारी कर्ज को लेकर राजनीतिक और आर्थिक गलियारों में चर्चा तेज है। विपक्ष जहां इसे आर्थिक बोझ बता रहा है, वहीं सरकार का दावा है कि यह निवेश देश के भविष्य और विकास की मजबूत नींव तैयार कर रहा है। |