• ग्राउंड रिपोर्ट : धरने से मौत तक: तीन साल से सुलग रहे सवालों के बीच एक जिंदगी खत्म.... एकलव्य आवासीय विद्यालय में भोजन और ट्रैक सूट की शिकायत से शुरू हुआ सिलसिला छात्रा की संदिग्ध मौत तक पहुंचा, अब व्यवस्था, जवाबदेही और बच्चों की सुरक्षा पर बड़े सवाल....

    JITENDRA KUMAWAT   - रतलाम
    ग्राउंड रिपोर्ट
    देश   - रतलाम[17-09-2026]

  • सैलाना/रतलाम

    एक छात्रावास में भोजन की गुणवत्ता और ट्रैक सूट की मांग से शुरू हुआ विवाद धीरे-धीरे शिकायतों, धरनों, प्रशासनिक हस्तक्षेप और प्रबंधन से नाराजगी के कई पड़ाव पार करता हुआ अब एक छात्रा की मौत तक पहुंच गया है। सैलाना के एकलव्य आदर्श आवासीय विद्यालय परिसर में कक्षा 12वीं की छात्रा वर्षा सोलंकी की संदिग्ध परिस्थितियों में मौत के बाद जो सवाल खड़े हुए हैं, वे केवल एक घटना तक सीमित नहीं हैं। पिछले कुछ समय से सामने आती रही शिकायतों और विरोध प्रदर्शनों ने विद्यालय की व्यवस्थाओं, विद्यार्थियों की शिकायतों के निराकरण, परीक्षा के दौरान संवेदनशीलता तथा हॉस्टल में बच्चों की निगरानी को लेकर गंभीर चर्चा छेड़ दी है।

    उपलब्ध घटनाक्रम के अनुसार 13 दिसंबर 2024 को भी 

    छात्रावास प्रबंधन से नाराजगी को लेकर छात्राओं के हंगामे की स्थिति बनी थी। इसके बाद विद्यार्थियों की विभिन्न मांगों और समस्याओं को लेकर विधायक कमलेश्वर डोडियार के साथ छात्र-छात्राओं ने स्कूल गेट पर करीब तीन घंटे तक धरना दिया था। बताया गया कि कुछ विद्यार्थी अपनी मांगों को लेकर पैदल रतलाम जाने की तैयारी में भी थे।

    इसके बाद 26 जनवरी को एक बार फिर भोजन व्यवस्था और ट्रैक सूट को लेकर छात्र-छात्राओं में नाराजगी सामने आई। बड़ी संख्या में विद्यार्थी धरने पर बैठ गए। सूचना मिलते ही जिला पंचायत उपाध्यक्ष एवं जिला शिक्षा समिति अध्यक्ष केशुराम निनामा तथा विधायक प्रतिनिधि विक्रम चारेल मौके पर पहुंचे और विद्यार्थियों से उनकी समस्याएं जानीं। प्रशासन की ओर से एसडीएम मनीष जैन, एसडीओपी नीलम बघेल, सहायक संचालक शिक्षा जनजातीय कार्य विभाग प्रीति जैन, तहसीलदार कैलाश कनोज सहित सैलाना थाना प्रभारी पृथ्वी सिंह खराटे और पुलिस बल मौके पर पहुंचे। अधिकारियों ने विद्यार्थियों से चर्चा कर समस्याओं के समाधान का आश्वासन दिया था।

    लेकिन घटनाक्रम यहीं नहीं रुका।

    परीक्षा कक्ष से हॉस्टल तक और फिर कभी वापस नहीं लौटी वर्षा

    मंगलवार को कक्षा 12वीं की छात्रा वर्षा पिता टीकाराम सोलंकी निवासी मेवाड़ पंथ, जिला देवास छमाही परीक्षा देने स्कूल पहुंची थी। परीक्षा सुबह 10 बजे से दोपहर 1:30 बजे तक निर्धारित थी। परीक्षा के दौरान शिक्षक मोहम्मद शेख को छात्रा के पास नकल की पर्ची होने का संदेह हुआ। उनके कहने पर शिक्षिका प्रीति लांबा ने छात्रा की जांच की, जिसमें एक पर्ची मिलने की बात सामने आई। पर्ची जब्त कर उसे उत्तरपुस्तिका के साथ नत्थी किए जाने की जानकारी सामने आई है।

    इसके बाद छात्रा को परीक्षा कक्ष से बाहर रहने के लिए कहा गया। घटनाक्रम के अनुसार करीब 11:30 बजे वह स्कूल से लगभग 100 कदम दूर स्थित छात्रावास में अपने कमरे में चली गई।

    कुछ समय बाद उसकी रूम पार्टनर लक्षिता और प्रतिभा ने उसे कमरे में फंदे पर लटका देखा। दोनों ने तत्काल कैची से रस्सी काटकर उसे नीचे उतारा, लेकिन तब तक उसकी मौत हो चुकी थी।

    वर्षा एकलव्य विद्यालय में कक्षा 12वीं आर्ट्स की छात्रा थी। उसका भाई आकाश सोलंकी भी इसी परिसर के बालक छात्रावास में रहकर कक्षा 10वीं में पढ़ रहा है।

    मौत के बाद फूटा विद्यार्थियों का आक्रोश

    घटना की सूचना के बाद सैलाना थाना प्रभारी पिंकी आकाश पुलिस बल के साथ मौके पर पहुंचीं। एसडीओपी नीलम बघेल, तहसीलदार मनीष जैन सहित अन्य अधिकारियों ने भी घटनास्थल पहुंचकर जानकारी ली। एफएसएल अधिकारी, फिंगरप्रिंट एक्सपर्ट प्रकाश राठी तथा एसडीएम सुनील जायसवाल असिस्टेंट कमिश्नर (AC) डॉ प्रियंका राय सहायक संचालक शिक्षा जनजातीय कार्य विभाग प्रीति जैन ने भी घटनास्थल का निरीक्षण किया।

    शाम करीब 6 बजे जब शव को पोस्टमार्टम के लिए ले जाने की प्रक्रिया शुरू हुई तो परिसर में मौजूद करीब 200 छात्राओं और 300 छात्रों सहित अन्य छात्रावासों के विद्यार्थियों ने भी विरोध शुरू कर दिया। विद्यार्थियों ने प्राचार्य नरेंद्र गंगवाल, वार्डन रेखा पारगी और शिक्षिका प्रीति लांबा के खिलाफ कार्रवाई की मांग रखी। मृतका के परिजनों को मुआवजा देने की मांग भी उठाई गई।

    इसके बाद रात करीब 7 बजे विद्यालय के मुख्य द्वार के सामने सैलाना-रतलाम मुख्य मार्ग पर भी विद्यार्थियों का विरोध प्रदर्शन हुआ। अधिकारियों की समझाइश के बावजूद विद्यार्थी अपनी मांगों पर डटे रहे।

    बाद में जिला पंचायत उपाध्यक्ष एवं जिला शिक्षा समिति अध्यक्ष केशुराम निनामा ने अधिकारियों से चर्चा की और कलेक्टर अजय कटेसरिया से फोन पर बातचीत की। चर्चा के बाद प्राचार्य नरेंद्र गंगवाल को हटाने तथा शिक्षिका प्रीति लांबा और वार्डन रेखा पारगी के संबंध में कार्रवाई का आश्वासन दिया गया। मृतका के परिवार को पांच लाख रुपये की सहायता राशि 10 दिन के भीतर दिए जाने की बात भी सामने आई, जिसके बाद देर रात धरना समाप्त हुआ और शव को पोस्टमार्टम के लिए मेडिकल कॉलेज भेजा गया।

    वहीं  बुधवार को सुबह पोस्टमार्टम हुआ वर्षा सोलंकी निवास मेवाड़ पंथ, जिला देवास में शाम को अन्तिम संस्कार किया गया पूरे गांव में मातम छा गया  

    प्राचार्य की भूमिका और जवाबदेही पर उठे सवाल

    इस पूरे मामले में विद्यालय के प्राचार्य नरेंद्र गंगवाल की भूमिका और जवाबदेही भी जांच के केंद्र में है। प्राचार्य विद्यालय की शैक्षणिक व्यवस्था, परीक्षा संचालन, छात्रावास प्रबंधन और विद्यार्थियों की सुरक्षा से जुड़ी समग्र प्रशासनिक जिम्मेदारी संभालते हैं। ऐसे में यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि परीक्षा के दौरान छात्रा के साथ हुई कार्रवाई के बाद उसकी निगरानी और भावनात्मक स्थिति को लेकर क्या व्यवस्था की गई थी।

    प्राचार्य नरेंद्र गंगवाल के अनुसार जब छात्रा हॉस्टल पहुंची, उस समय वहां दो सफाईकर्मी काम कर रहे थे। वार्डन रेखा पारगी के अनुसार वे प्राचार्य से मिलने उनके कार्यालय गई थीं और परीक्षा चलने के कारण ऊपर छात्राओं के कमरों की ओर नहीं गईं। परीक्षा समाप्त होने के बाद रूममेट्स के हॉस्टल पहुंचने पर उन्हें घटना की जानकारी मिली।

    इन बयानों के बीच यह जांचना जरूरी है कि प्राचार्य कार्यालय, परीक्षा कक्ष और छात्रावास के बीच उस समय समन्वय की क्या व्यवस्था थी। क्या छात्रा को परीक्षा कक्ष से बाहर भेजे जाने की सूचना हॉस्टल प्रशासन को दी गई थी? क्या किसी शिक्षक, वार्डन या जिम्मेदार कर्मचारी को छात्रा पर नजर रखने के निर्देश दिए गए थे? क्या छात्रा की मानसिक स्थिति को समझने या उससे संवाद करने का प्रयास किया गया? इन सवालों के जवाब प्राचार्य की प्रशासनिक जवाबदेही तय करने में महत्वपूर्ण हो सकते हैं।

    विद्यार्थियों ने प्राचार्य को हटाने की मांग इसलिए भी उठाई कि उनके अनुसार विद्यालय में पहले से भोजन, ट्रैक सूट और अन्य अव्यवस्थाओं को लेकर और भी शिकायतें सामने आती रही थीं। 

    प्राचार्य नरेन्द्र गंगवाल का शिकायत पर रवैया कुछ इस प्रकार सै भी रहता था 

    पालक, स्टाफ या किसी पत्रकार द्वारा स्कूल की समस्या या शिकायत बताने पर प्रिंसिपल नरेंद्र गंगवाल का कहना रहता था कि वे केंद्रीय विद्यालय से हैं और उनका संबंध सीधे दिल्ली से है, इसलिए कलेक्टर भी उनका कुछ नहीं कर सकते। केंद्रीय विद्यालय होने की आड़ में वे मनमानी चलाते थे और कलेक्टर के अधिकार क्षेत्र से बाहर होने का दावा करते थे।

    हालांकि प्राचार्य की व्यक्तिगत भूमिका और किसी भी संभावित लापरवाही का अंतिम निर्धारण जांच, दस्तावेजों, प्रत्यक्षदर्शियों के बयान और उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर ही माना जा सकता है।

    एक अधिकारी की नहीं, पूरी व्यवस्था की परीक्षा

    घटना के बाद प्रशासन ने सुरक्षा व्यवस्था को देखते हुए रावटी थाना प्रभारी सुरेंद्र सिंह गड़रिया, बाजना थाना प्रभारी रविंद्र दड़ोतिया और सरवन थाना प्रभारी अर्जुन सेमलिया को भी पुलिस बल के साथ मौके पर भेजा। इससे स्थिति की गंभीरता का अंदाजा लगाया जा सकता है।

    केशुराम निनामा ने विद्यालय प्राचार्य के खिलाफ कार्रवाई और एफआईआर की मांग को लेकर एसडीओपी नीलम बघेल को आवेदन देने की बात भी सामने आई है।

    वहीं, घटना के बाद तहसीलदार मनीष जैन ने परीक्षा ड्यूटी पर तैनात शिक्षिका और वार्डन की कार्यप्रणाली को लेकर नाराजगी जताते हुए फटकार लगाई। 

    हालांकि इस पूरे मामले में किसकी क्या जिम्मेदारी थी और छात्रा की मौत के पीछे वास्तविक कारण क्या था, इसका निर्धारण पुलिस जांच और उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर ही किया जा सकता है।

    पोस्टमार्टम रतलाम में, अंतिम संस्कार गांव में

    वर्षा के शव का पोस्टमार्टम बुधवार सुबह रतलाम अस्पताल में किया गया। पोस्टमार्टम की प्रक्रिया पूरी होने के बाद शव परिजनों को सौंपा गया और बुधवार शाम उसके गांव में अंतिम संस्कार किया गया। एक परिवार की बेटी को अंतिम विदाई देने के साथ ही गांव और विद्यालय परिसर में शोक का माहौल रहा।

    अब पोस्टमार्टम रिपोर्ट और पुलिस जांच से यह स्पष्ट होने की उम्मीद है कि छात्रा की मौत से पहले की परिस्थितियां क्या थीं। 

    जांच में परीक्षा कक्ष से लेकर हॉस्टल तक की गतिविधियों, छात्रा के साथ हुए व्यवहार, घटनास्थल की स्थिति और प्रत्यक्षदर्शियों के बयानों को महत्वपूर्ण माना जा रहा है।

    सवाल केवल नकल की पर्ची का नहीं है

    इस पूरी घटना में सबसे बड़ा सवाल यह नहीं है कि परीक्षा में पर्ची मिली या नहीं। सवाल यह है कि एक आवासीय विद्यालय में पढ़ने वाली बच्ची के मानसिक और भावनात्मक हालात को उस समय किस तरह संभाला गया? परीक्षा संबंधी कार्रवाई के बाद छात्रा हॉस्टल तक कैसे पहुंची? हॉस्टल में उस दौरान उसकी निगरानी की क्या व्यवस्था थी? स्कूल और हॉस्टल के बीच जिम्मेदारी किसकी थी? घटना से पहले और बाद में प्रबंधन ने क्या कदम उठाए? इन सवालों के जवाब जांच का महत्वपूर्ण हिस्सा हो सकते हैं।

    प्राचार्य नरेंद्र गंगवाल के अनुसार जब छात्रा हॉस्टल पहुंची, उस समय वहां दो सफाईकर्मी काम कर रहे थे। वार्डन रेखा पारगी के अनुसार वे प्राचार्य से मिलने उनके कार्यालय गई थीं और परीक्षा चलने के कारण ऊपर छात्राओं के कमरों की ओर नहीं गईं। परीक्षा समाप्त होने के बाद रूममेट्स के हॉस्टल पहुंचने पर उन्हें घटना की जानकारी मिली।

    इन बयानों के बीच हॉस्टल की निगरानी व्यवस्था को लेकर उठे सवालों का तथ्यात्मक परीक्षण जरूरी है। साथ ही यह भी देखा जाना चाहिए कि क्या विद्यालय में विद्यार्थियों के लिए काउंसलिंग, शिकायत निवारण और संकट की स्थिति में तत्काल सहायता की कोई प्रभावी व्यवस्था मौजूद थी।

    शिकायतों से लेकर मौत तक—क्या सीखा गया?

    इस पूरे घटनाक्रम को पीछे मुड़कर देखें तो वर्ष 2024 से ही विद्यार्थियों की नाराजगी और प्रबंधन संबंधी शिकायतों की बातें सामने आती रही हैं। भोजन, ट्रैक सूट और अन्य व्यवस्थाओं को लेकर विद्यार्थियों के धरने हुए। प्रशासनिक अधिकारी मौके पर पहुंचे, समझाइश हुई और समाधान के आश्वासन भी दिए गए।

    लेकिन अब एक छात्रा की मौत के बाद सवाल यह है कि क्या केवल तत्कालीन विवाद शांत कर देना पर्याप्त था?

    विद्यालय में पढ़ने वाले बच्चे केवल परीक्षा देने वाले विद्यार्थी नहीं हैं। वे परिवार से दूर रहकर आवासीय परिसर में जीवन बिताते हैं। इसलिए उनकी शिक्षा के साथ-साथ संवाद, अनुशासन, भावनात्मक सुरक्षा, शिकायतों की सुनवाई और समय पर हस्तक्षेप भी उतने ही महत्वपूर्ण हैं।

    विरोध प्रदर्शन में विद्यार्थियों द्वारा अधिकारियों के सामने अपनी मांगें रखने का तरीका भी शिक्षा व्यवस्था के लिए विचार का विषय है। बच्चों को अपनी बात रखना सिखाना जरूरी है, लेकिन इसके साथ संवाद, संयम और असहमति के लोकतांत्रिक तरीके भी सिखाए जाने चाहिए। यह जिम्मेदारी केवल स्कूल की नहीं, बल्कि परिवार, समाज और पूरी शिक्षा व्यवस्था की है।

    राजनीति से ज्यादा जरूरी है बच्चों का भविष्य

    विद्यालय परिसर में किसी भी राजनीतिक दल या जनप्रतिनिधि की भूमिका को लेकर भी अलग-अलग मत हो सकते हैं। विद्यार्थियों की शिकायतों को प्रशासन तक पहुंचाने में जनप्रतिनिधियों की भूमिका सामने आई है, वहीं यह भी महत्वपूर्ण है कि शैक्षणिक संस्थानों में निर्णय और जांच निर्धारित प्रशासनिक एवं संस्थागत प्रक्रियाओं के अनुसार हों। बच्चों की समस्याओं को राजनीतिक खींचतान का विषय बनाने के बजाय उनकी शिक्षा, सुरक्षा और अधिकारों को केंद्र में रखना जरूरी है।

    आज सबसे बड़ा सवाल यही है—क्या एक बच्ची की मौत के बाद व्यवस्था केवल कार्रवाई तक सीमित रहेगी या उन कारणों की भी जांच होगी जिनके चलते एक आवासीय विद्यालय में विद्यार्थियों के भीतर लगातार असंतोष और असुरक्षा की स्थिति पैदा होने की बातें सामने आती रही हैं?

    वर्षा अब इस दुनिया में नहीं है। उसके जाने के वास्तविक कारण का फैसला जांच, पोस्टमार्टम रिपोर्ट और उपलब्ध साक्ष्यों से होगा। लेकिन उसकी मौत ने एक ऐसा सवाल जरूर छोड़ दिया है, जिसका जवाब केवल एक विद्यालय नहीं, बल्कि पूरी शिक्षा व्यवस्था को तलाशना होगा।

    बच्चों को केवल किताबों और परीक्षाओं के लिए तैयार करना पर्याप्त नहीं है। उन्हें असफलता, गलती, दबाव, अनुशासन और जीवन की कठिन परिस्थितियों से निपटना भी सिखाना होगा। 

    क्योंकि परीक्षा की एक पर्ची, एक गलती या एक डांट किसी बच्चे की पूरी जिंदगी से बड़ी नहीं हो सकती।

    रिपोर्टर जितेन्द्र कुमावत







  • ग्राउंड रिपोर्ट : धरने से मौत तक: तीन साल से सुलग रहे सवालों के बीच एक जिंदगी खत्म.... एकलव्य आवासीय विद्यालय में भोजन और ट्रैक सूट की शिकायत से शुरू हुआ सिलसिला छात्रा की संदिग्ध मौत तक पहुंचा, अब व्यवस्था, जवाबदेही और बच्चों की सुरक्षा पर बड़े सवाल....

    JITENDRA KUMAWAT   - रतलाम
    ग्राउंड रिपोर्ट
    देश   - रतलाम[17-09-2026]


    सैलाना/रतलाम

    एक छात्रावास में भोजन की गुणवत्ता और ट्रैक सूट की मांग से शुरू हुआ विवाद धीरे-धीरे शिकायतों, धरनों, प्रशासनिक हस्तक्षेप और प्रबंधन से नाराजगी के कई पड़ाव पार करता हुआ अब एक छात्रा की मौत तक पहुंच गया है। सैलाना के एकलव्य आदर्श आवासीय विद्यालय परिसर में कक्षा 12वीं की छात्रा वर्षा सोलंकी की संदिग्ध परिस्थितियों में मौत के बाद जो सवाल खड़े हुए हैं, वे केवल एक घटना तक सीमित नहीं हैं। पिछले कुछ समय से सामने आती रही शिकायतों और विरोध प्रदर्शनों ने विद्यालय की व्यवस्थाओं, विद्यार्थियों की शिकायतों के निराकरण, परीक्षा के दौरान संवेदनशीलता तथा हॉस्टल में बच्चों की निगरानी को लेकर गंभीर चर्चा छेड़ दी है।

    उपलब्ध घटनाक्रम के अनुसार 13 दिसंबर 2024 को भी 

    छात्रावास प्रबंधन से नाराजगी को लेकर छात्राओं के हंगामे की स्थिति बनी थी। इसके बाद विद्यार्थियों की विभिन्न मांगों और समस्याओं को लेकर विधायक कमलेश्वर डोडियार के साथ छात्र-छात्राओं ने स्कूल गेट पर करीब तीन घंटे तक धरना दिया था। बताया गया कि कुछ विद्यार्थी अपनी मांगों को लेकर पैदल रतलाम जाने की तैयारी में भी थे।

    इसके बाद 26 जनवरी को एक बार फिर भोजन व्यवस्था और ट्रैक सूट को लेकर छात्र-छात्राओं में नाराजगी सामने आई। बड़ी संख्या में विद्यार्थी धरने पर बैठ गए। सूचना मिलते ही जिला पंचायत उपाध्यक्ष एवं जिला शिक्षा समिति अध्यक्ष केशुराम निनामा तथा विधायक प्रतिनिधि विक्रम चारेल मौके पर पहुंचे और विद्यार्थियों से उनकी समस्याएं जानीं। प्रशासन की ओर से एसडीएम मनीष जैन, एसडीओपी नीलम बघेल, सहायक संचालक शिक्षा जनजातीय कार्य विभाग प्रीति जैन, तहसीलदार कैलाश कनोज सहित सैलाना थाना प्रभारी पृथ्वी सिंह खराटे और पुलिस बल मौके पर पहुंचे। अधिकारियों ने विद्यार्थियों से चर्चा कर समस्याओं के समाधान का आश्वासन दिया था।

    लेकिन घटनाक्रम यहीं नहीं रुका।

    परीक्षा कक्ष से हॉस्टल तक और फिर कभी वापस नहीं लौटी वर्षा

    मंगलवार को कक्षा 12वीं की छात्रा वर्षा पिता टीकाराम सोलंकी निवासी मेवाड़ पंथ, जिला देवास छमाही परीक्षा देने स्कूल पहुंची थी। परीक्षा सुबह 10 बजे से दोपहर 1:30 बजे तक निर्धारित थी। परीक्षा के दौरान शिक्षक मोहम्मद शेख को छात्रा के पास नकल की पर्ची होने का संदेह हुआ। उनके कहने पर शिक्षिका प्रीति लांबा ने छात्रा की जांच की, जिसमें एक पर्ची मिलने की बात सामने आई। पर्ची जब्त कर उसे उत्तरपुस्तिका के साथ नत्थी किए जाने की जानकारी सामने आई है।

    इसके बाद छात्रा को परीक्षा कक्ष से बाहर रहने के लिए कहा गया। घटनाक्रम के अनुसार करीब 11:30 बजे वह स्कूल से लगभग 100 कदम दूर स्थित छात्रावास में अपने कमरे में चली गई।

    कुछ समय बाद उसकी रूम पार्टनर लक्षिता और प्रतिभा ने उसे कमरे में फंदे पर लटका देखा। दोनों ने तत्काल कैची से रस्सी काटकर उसे नीचे उतारा, लेकिन तब तक उसकी मौत हो चुकी थी।

    वर्षा एकलव्य विद्यालय में कक्षा 12वीं आर्ट्स की छात्रा थी। उसका भाई आकाश सोलंकी भी इसी परिसर के बालक छात्रावास में रहकर कक्षा 10वीं में पढ़ रहा है।

    मौत के बाद फूटा विद्यार्थियों का आक्रोश

    घटना की सूचना के बाद सैलाना थाना प्रभारी पिंकी आकाश पुलिस बल के साथ मौके पर पहुंचीं। एसडीओपी नीलम बघेल, तहसीलदार मनीष जैन सहित अन्य अधिकारियों ने भी घटनास्थल पहुंचकर जानकारी ली। एफएसएल अधिकारी, फिंगरप्रिंट एक्सपर्ट प्रकाश राठी तथा एसडीएम सुनील जायसवाल असिस्टेंट कमिश्नर (AC) डॉ प्रियंका राय सहायक संचालक शिक्षा जनजातीय कार्य विभाग प्रीति जैन ने भी घटनास्थल का निरीक्षण किया।

    शाम करीब 6 बजे जब शव को पोस्टमार्टम के लिए ले जाने की प्रक्रिया शुरू हुई तो परिसर में मौजूद करीब 200 छात्राओं और 300 छात्रों सहित अन्य छात्रावासों के विद्यार्थियों ने भी विरोध शुरू कर दिया। विद्यार्थियों ने प्राचार्य नरेंद्र गंगवाल, वार्डन रेखा पारगी और शिक्षिका प्रीति लांबा के खिलाफ कार्रवाई की मांग रखी। मृतका के परिजनों को मुआवजा देने की मांग भी उठाई गई।

    इसके बाद रात करीब 7 बजे विद्यालय के मुख्य द्वार के सामने सैलाना-रतलाम मुख्य मार्ग पर भी विद्यार्थियों का विरोध प्रदर्शन हुआ। अधिकारियों की समझाइश के बावजूद विद्यार्थी अपनी मांगों पर डटे रहे।

    बाद में जिला पंचायत उपाध्यक्ष एवं जिला शिक्षा समिति अध्यक्ष केशुराम निनामा ने अधिकारियों से चर्चा की और कलेक्टर अजय कटेसरिया से फोन पर बातचीत की। चर्चा के बाद प्राचार्य नरेंद्र गंगवाल को हटाने तथा शिक्षिका प्रीति लांबा और वार्डन रेखा पारगी के संबंध में कार्रवाई का आश्वासन दिया गया। मृतका के परिवार को पांच लाख रुपये की सहायता राशि 10 दिन के भीतर दिए जाने की बात भी सामने आई, जिसके बाद देर रात धरना समाप्त हुआ और शव को पोस्टमार्टम के लिए मेडिकल कॉलेज भेजा गया।

    वहीं  बुधवार को सुबह पोस्टमार्टम हुआ वर्षा सोलंकी निवास मेवाड़ पंथ, जिला देवास में शाम को अन्तिम संस्कार किया गया पूरे गांव में मातम छा गया  

    प्राचार्य की भूमिका और जवाबदेही पर उठे सवाल

    इस पूरे मामले में विद्यालय के प्राचार्य नरेंद्र गंगवाल की भूमिका और जवाबदेही भी जांच के केंद्र में है। प्राचार्य विद्यालय की शैक्षणिक व्यवस्था, परीक्षा संचालन, छात्रावास प्रबंधन और विद्यार्थियों की सुरक्षा से जुड़ी समग्र प्रशासनिक जिम्मेदारी संभालते हैं। ऐसे में यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि परीक्षा के दौरान छात्रा के साथ हुई कार्रवाई के बाद उसकी निगरानी और भावनात्मक स्थिति को लेकर क्या व्यवस्था की गई थी।

    प्राचार्य नरेंद्र गंगवाल के अनुसार जब छात्रा हॉस्टल पहुंची, उस समय वहां दो सफाईकर्मी काम कर रहे थे। वार्डन रेखा पारगी के अनुसार वे प्राचार्य से मिलने उनके कार्यालय गई थीं और परीक्षा चलने के कारण ऊपर छात्राओं के कमरों की ओर नहीं गईं। परीक्षा समाप्त होने के बाद रूममेट्स के हॉस्टल पहुंचने पर उन्हें घटना की जानकारी मिली।

    इन बयानों के बीच यह जांचना जरूरी है कि प्राचार्य कार्यालय, परीक्षा कक्ष और छात्रावास के बीच उस समय समन्वय की क्या व्यवस्था थी। क्या छात्रा को परीक्षा कक्ष से बाहर भेजे जाने की सूचना हॉस्टल प्रशासन को दी गई थी? क्या किसी शिक्षक, वार्डन या जिम्मेदार कर्मचारी को छात्रा पर नजर रखने के निर्देश दिए गए थे? क्या छात्रा की मानसिक स्थिति को समझने या उससे संवाद करने का प्रयास किया गया? इन सवालों के जवाब प्राचार्य की प्रशासनिक जवाबदेही तय करने में महत्वपूर्ण हो सकते हैं।

    विद्यार्थियों ने प्राचार्य को हटाने की मांग इसलिए भी उठाई कि उनके अनुसार विद्यालय में पहले से भोजन, ट्रैक सूट और अन्य अव्यवस्थाओं को लेकर और भी शिकायतें सामने आती रही थीं। 

    प्राचार्य नरेन्द्र गंगवाल का शिकायत पर रवैया कुछ इस प्रकार सै भी रहता था 

    पालक, स्टाफ या किसी पत्रकार द्वारा स्कूल की समस्या या शिकायत बताने पर प्रिंसिपल नरेंद्र गंगवाल का कहना रहता था कि वे केंद्रीय विद्यालय से हैं और उनका संबंध सीधे दिल्ली से है, इसलिए कलेक्टर भी उनका कुछ नहीं कर सकते। केंद्रीय विद्यालय होने की आड़ में वे मनमानी चलाते थे और कलेक्टर के अधिकार क्षेत्र से बाहर होने का दावा करते थे।

    हालांकि प्राचार्य की व्यक्तिगत भूमिका और किसी भी संभावित लापरवाही का अंतिम निर्धारण जांच, दस्तावेजों, प्रत्यक्षदर्शियों के बयान और उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर ही माना जा सकता है।

    एक अधिकारी की नहीं, पूरी व्यवस्था की परीक्षा

    घटना के बाद प्रशासन ने सुरक्षा व्यवस्था को देखते हुए रावटी थाना प्रभारी सुरेंद्र सिंह गड़रिया, बाजना थाना प्रभारी रविंद्र दड़ोतिया और सरवन थाना प्रभारी अर्जुन सेमलिया को भी पुलिस बल के साथ मौके पर भेजा। इससे स्थिति की गंभीरता का अंदाजा लगाया जा सकता है।

    केशुराम निनामा ने विद्यालय प्राचार्य के खिलाफ कार्रवाई और एफआईआर की मांग को लेकर एसडीओपी नीलम बघेल को आवेदन देने की बात भी सामने आई है।

    वहीं, घटना के बाद तहसीलदार मनीष जैन ने परीक्षा ड्यूटी पर तैनात शिक्षिका और वार्डन की कार्यप्रणाली को लेकर नाराजगी जताते हुए फटकार लगाई। 

    हालांकि इस पूरे मामले में किसकी क्या जिम्मेदारी थी और छात्रा की मौत के पीछे वास्तविक कारण क्या था, इसका निर्धारण पुलिस जांच और उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर ही किया जा सकता है।

    पोस्टमार्टम रतलाम में, अंतिम संस्कार गांव में

    वर्षा के शव का पोस्टमार्टम बुधवार सुबह रतलाम अस्पताल में किया गया। पोस्टमार्टम की प्रक्रिया पूरी होने के बाद शव परिजनों को सौंपा गया और बुधवार शाम उसके गांव में अंतिम संस्कार किया गया। एक परिवार की बेटी को अंतिम विदाई देने के साथ ही गांव और विद्यालय परिसर में शोक का माहौल रहा।

    अब पोस्टमार्टम रिपोर्ट और पुलिस जांच से यह स्पष्ट होने की उम्मीद है कि छात्रा की मौत से पहले की परिस्थितियां क्या थीं। 

    जांच में परीक्षा कक्ष से लेकर हॉस्टल तक की गतिविधियों, छात्रा के साथ हुए व्यवहार, घटनास्थल की स्थिति और प्रत्यक्षदर्शियों के बयानों को महत्वपूर्ण माना जा रहा है।

    सवाल केवल नकल की पर्ची का नहीं है

    इस पूरी घटना में सबसे बड़ा सवाल यह नहीं है कि परीक्षा में पर्ची मिली या नहीं। सवाल यह है कि एक आवासीय विद्यालय में पढ़ने वाली बच्ची के मानसिक और भावनात्मक हालात को उस समय किस तरह संभाला गया? परीक्षा संबंधी कार्रवाई के बाद छात्रा हॉस्टल तक कैसे पहुंची? हॉस्टल में उस दौरान उसकी निगरानी की क्या व्यवस्था थी? स्कूल और हॉस्टल के बीच जिम्मेदारी किसकी थी? घटना से पहले और बाद में प्रबंधन ने क्या कदम उठाए? इन सवालों के जवाब जांच का महत्वपूर्ण हिस्सा हो सकते हैं।

    प्राचार्य नरेंद्र गंगवाल के अनुसार जब छात्रा हॉस्टल पहुंची, उस समय वहां दो सफाईकर्मी काम कर रहे थे। वार्डन रेखा पारगी के अनुसार वे प्राचार्य से मिलने उनके कार्यालय गई थीं और परीक्षा चलने के कारण ऊपर छात्राओं के कमरों की ओर नहीं गईं। परीक्षा समाप्त होने के बाद रूममेट्स के हॉस्टल पहुंचने पर उन्हें घटना की जानकारी मिली।

    इन बयानों के बीच हॉस्टल की निगरानी व्यवस्था को लेकर उठे सवालों का तथ्यात्मक परीक्षण जरूरी है। साथ ही यह भी देखा जाना चाहिए कि क्या विद्यालय में विद्यार्थियों के लिए काउंसलिंग, शिकायत निवारण और संकट की स्थिति में तत्काल सहायता की कोई प्रभावी व्यवस्था मौजूद थी।

    शिकायतों से लेकर मौत तक—क्या सीखा गया?

    इस पूरे घटनाक्रम को पीछे मुड़कर देखें तो वर्ष 2024 से ही विद्यार्थियों की नाराजगी और प्रबंधन संबंधी शिकायतों की बातें सामने आती रही हैं। भोजन, ट्रैक सूट और अन्य व्यवस्थाओं को लेकर विद्यार्थियों के धरने हुए। प्रशासनिक अधिकारी मौके पर पहुंचे, समझाइश हुई और समाधान के आश्वासन भी दिए गए।

    लेकिन अब एक छात्रा की मौत के बाद सवाल यह है कि क्या केवल तत्कालीन विवाद शांत कर देना पर्याप्त था?

    विद्यालय में पढ़ने वाले बच्चे केवल परीक्षा देने वाले विद्यार्थी नहीं हैं। वे परिवार से दूर रहकर आवासीय परिसर में जीवन बिताते हैं। इसलिए उनकी शिक्षा के साथ-साथ संवाद, अनुशासन, भावनात्मक सुरक्षा, शिकायतों की सुनवाई और समय पर हस्तक्षेप भी उतने ही महत्वपूर्ण हैं।

    विरोध प्रदर्शन में विद्यार्थियों द्वारा अधिकारियों के सामने अपनी मांगें रखने का तरीका भी शिक्षा व्यवस्था के लिए विचार का विषय है। बच्चों को अपनी बात रखना सिखाना जरूरी है, लेकिन इसके साथ संवाद, संयम और असहमति के लोकतांत्रिक तरीके भी सिखाए जाने चाहिए। यह जिम्मेदारी केवल स्कूल की नहीं, बल्कि परिवार, समाज और पूरी शिक्षा व्यवस्था की है।

    राजनीति से ज्यादा जरूरी है बच्चों का भविष्य

    विद्यालय परिसर में किसी भी राजनीतिक दल या जनप्रतिनिधि की भूमिका को लेकर भी अलग-अलग मत हो सकते हैं। विद्यार्थियों की शिकायतों को प्रशासन तक पहुंचाने में जनप्रतिनिधियों की भूमिका सामने आई है, वहीं यह भी महत्वपूर्ण है कि शैक्षणिक संस्थानों में निर्णय और जांच निर्धारित प्रशासनिक एवं संस्थागत प्रक्रियाओं के अनुसार हों। बच्चों की समस्याओं को राजनीतिक खींचतान का विषय बनाने के बजाय उनकी शिक्षा, सुरक्षा और अधिकारों को केंद्र में रखना जरूरी है।

    आज सबसे बड़ा सवाल यही है—क्या एक बच्ची की मौत के बाद व्यवस्था केवल कार्रवाई तक सीमित रहेगी या उन कारणों की भी जांच होगी जिनके चलते एक आवासीय विद्यालय में विद्यार्थियों के भीतर लगातार असंतोष और असुरक्षा की स्थिति पैदा होने की बातें सामने आती रही हैं?

    वर्षा अब इस दुनिया में नहीं है। उसके जाने के वास्तविक कारण का फैसला जांच, पोस्टमार्टम रिपोर्ट और उपलब्ध साक्ष्यों से होगा। लेकिन उसकी मौत ने एक ऐसा सवाल जरूर छोड़ दिया है, जिसका जवाब केवल एक विद्यालय नहीं, बल्कि पूरी शिक्षा व्यवस्था को तलाशना होगा।

    बच्चों को केवल किताबों और परीक्षाओं के लिए तैयार करना पर्याप्त नहीं है। उन्हें असफलता, गलती, दबाव, अनुशासन और जीवन की कठिन परिस्थितियों से निपटना भी सिखाना होगा। 

    क्योंकि परीक्षा की एक पर्ची, एक गलती या एक डांट किसी बच्चे की पूरी जिंदगी से बड़ी नहीं हो सकती।

    रिपोर्टर जितेन्द्र कुमावत





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