रतलाम / सैलाना
अंतर्राष्ट्रीय जैव-विविधता दिवस 2026 के अवसर पर सैलाना ब्लॉक के ग्राम जांबूकुडी में वाग्धारा एवं कृषि एवं आदिवासी स्वराज संगठन के नेतृत्व में आयोजित सामुदायिक कार्यक्रम ने प्रकृति संरक्षण और आदिवासी पारंपरिक ज्ञान की ताकत को नई पहचान दी। “आदिवासी पारंपरिक ज्ञान और प्रकृति संरक्षण पर संवाद” विषयक इस विशेष आयोजन में ग्रामीणों, युवाओं, महिलाओं और बच्चों ने बढ़-चढ़कर भाग लेते हुए जल, जंगल, जमीन और जैव-विविधता संरक्षण का मजबूत संदेश दिया।
इस वर्ष कार्यक्रम की थीम “आदिवासी पारंपरिक एवं स्थानीय ज्ञान से संरक्षित होगी वैश्विक जैव-विविधता” रखी गई, जबकि उप-विषय “नई पीढ़ी के साथ — बीज, वनस्पति, जल और जीवों की विविधता संरक्षण की साझा पहल” रहा। कार्यक्रम की शुरुआत जागरूकता रैली से हुई, जिसमें सक्षम समूह, बाल स्वराज समूह और ग्राम स्वराज समूह के सदस्यों ने पारंपरिक वाद्ययंत्रों, लोकगीतों और नारों के साथ पूरे गांव में जनजागरण किया। “जल बचाओ, जंगल बचाओ”, “देशी बीज अपनाओ” जैसे नारों से पूरा वातावरण प्रकृति संरक्षण के संदेश से गूंज उठा।
कार्यक्रम में जैव-विविधता, प्राकृतिक खेती, देशी बीज और वन संरक्षण पर आधारित लघु फिल्मों का प्रदर्शन किया गया। संवाद सत्र के दौरान वरिष्ठ ग्रामीणों और महिलाओं ने बताया कि आदिवासी समाज सदियों से जंगल, जल स्रोत, औषधीय वनस्पतियों और पारंपरिक बीजों का संरक्षण करता आया है। उन्होंने कहा कि प्रकृति केवल संसाधन नहीं, बल्कि जीवन और संस्कृति का आधार है।
स्थानीय जैव-विविधता प्रदर्शनी कार्यक्रम का मुख्य आकर्षण रही, जिसमें देशी बीज, औषधीय पौधे, स्थानीय फल एवं पारंपरिक खाद्य सामग्री प्रदर्शित की गई। युवाओं और बच्चों ने लोकगीतों व सांस्कृतिक प्रस्तुतियों के माध्यम से प्रकृति संरक्षण की अपनी जिम्मेदारी को प्रभावी ढंग से प्रस्तुत किया।
सामुदायिक श्रमदान “हलमा” गतिविधि के जरिए ग्रामीणों ने सामूहिक भागीदारी का अनूठा उदाहरण पेश किया और जल स्रोतों, जंगलों तथा सामुदायिक भूमि के संरक्षण का संकल्प लिया। वक्ताओं ने कहा कि जलवायु परिवर्तन, जल संकट और जैव-विविधता क्षरण जैसी वैश्विक चुनौतियों का समाधान आदिवासी समुदायों की पारंपरिक जीवन शैली और स्थानीय ज्ञान में छिपा है।
कार्यक्रम के अंत में सभी उपस्थित लोगों ने जैव-विविधता संरक्षण की शपथ लेते हुए आने वाली पीढ़ियों तक प्रकृति संरक्षण का संदेश पहुंचाने का संकल्प लिया। आयोजन ने यह स्पष्ट संदेश दिया कि यदि स्थानीय समुदायों को संरक्षण की प्रक्रिया के केंद्र में रखा जाए तो वास्तव में “स्थानीय उपायों से ही वैश्विक समाधान संभव” बन सकता है।
रिपोर्टर जितेन्द्र कुमावत