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उज्जैन: मोक्षदायिनी शिप्रा नदी आज अपनी बदहाल स्थिति पर मानो आँसू बहा रही है। शहर के कई स्थानों पर खुलेआम नालों का गंदा पानी सीधे शिप्रा में मिल रहा है, लेकिन इसे रोकने के लिए प्रभावी कदम नजर नहीं आ रहे। यह स्थिति नई नहीं है, बल्कि कई वर्षों से यही हाल बना हुआ है। ऐसे में सवाल उठता है कि आखिर शिप्रा को इस प्रदूषण से मुक्ति कब मिलेगी? हाल ही में नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (एनजीटी) के संयुक्त जांच दल ने उज्जैन के विभिन्न घाटों का निरीक्षण कर नदी की वास्तविक स्थिति का जायजा लिया। शिप्रा की दुर्दशा को लेकर श्री रमेशचन्द्र दुबे द्वारा दायर याचिका पर सुनवाई करते हुए एनजीटी ने यह संयुक्त जांच दल गठित किया था। इस दल में सेंट्रल पॉल्यूशन कंट्रोल बोर्ड भोपाल के वैज्ञानिक डॉ. अनूप चतुर्वेदी, मिनिस्ट्री ऑफ इनवायरमेंट एंड फॉरेस्ट के रीजनल ऑफिस के राजशेखर रेड्डी और एप्को भोपाल के असिस्टेंट साइंटिफिक ऑफिसर डॉ. मनोज विश्वकर्मा शामिल थे। जांच दल ने पूरे दिन शिप्रा नदी के विभिन्न स्थानों का निरीक्षण किया और कई जगहों की वीडियोग्राफी भी करवाई। निरीक्षण के दौरान कई गंभीर अनियमितताएं सामने आईं। वाल्मीकि धाम, ऋणमुक्तेश्वर महादेव मंदिर और मंगलनाथ मंदिर के पीछे से गंदे नालों का पानी सीधे शिप्रा में मिलता हुआ पाया गया। इसके अलावा गंगा घाट के पास 50 वर्ष से अधिक पुराने छायादार पेड़ों को मशीनों से काटे जाने की भी जानकारी सामने आई। भेरूगढ़ क्षेत्र में दिल्ली दरवाजे के पास प्रिंटिंग कारखानों का दूषित और जहरीला पानी भी नदी में मिलते हुए पाया गया। जांच दल ने शिप्रा नदी के किनारे बन रहे लगभग 29 किलोमीटर लंबे घाट और 7 फीट ऊंची सुरक्षा दीवार का भी निरीक्षण किया। विशेषज्ञों ने आशंका जताई कि बारिश के समय यह दीवारें नदी के प्राकृतिक बहाव को प्रभावित कर सकती हैं। एनजीटी की टीम ने रामघाट, नृसिंह घाट, गऊघाट और त्रिवेणी घाट पर पानी की गुणवत्ता की जांच की, जो मानक स्तर से काफी नीचे पाई गई। जांच में यह भी सामने आया कि स्वच्छता के तमाम दावों के बावजूद कई बड़े नाले और औद्योगिक इकाइयाँ लगातार अपनी गंदगी शिप्रा में बहा रही हैं। रुद्र सागर क्षेत्र का नाला उज्जैन का सबसे बड़ा और चर्चित नाला है। सीवरेज ट्रीटमेंट प्लांट (एसटीपी) के दावों के बावजूद बारिश या तकनीकी खराबी के दौरान इसका गंदा पानी सीधे रामघाट के पास शिप्रा में मिल जाता है। इसके अलावा चक्रतीर्थ श्मशान घाट और ऋणमुक्तेश्वर मंदिर के आसपास भी कई छोटे-बड़े नाले खुलेआम नदी में मिल रहे हैं, जिससे यहां का पानी काला पड़ चुका है। शिप्रा नदी के प्रदूषण की सबसे बड़ी वजह खान नदी को माना जाता है। इंदौर से आने वाली यह नदी पूरी तरह प्रदूषित है। इसके लिए करीब 100 करोड़ रुपये की लागत से खान क्लोज डक्ट परियोजना बनाई गई थी, लेकिन रिसाव के कारण अक्सर इसका जहरीला पानी त्रिवेणी संगम पर शिप्रा में मिल जाता है। यहां वर्षों से मिट्टी का कच्चा बांध बनाया जाता है, जो हर बारिश में टूट जाता है और खान नदी का दूषित पानी सीधे शिप्रा में पहुंच जाता है। आरोप है कि कच्चे बांध में हो रहे भ्रष्टाचार के कारण आज तक यहां पक्का बांध नहीं बन पाया। प्रदेश के मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव उज्जैन के निवासी और यहां से विधायक भी हैं। ऐसे में उम्मीद की जा रही है कि वे शिप्रा में मिल रहे गंदे नालों पर स्थायी रोक लगाने, त्रिवेणी संगम पर पक्का बांध बनाने और नदी को स्वच्छ बनाए रखने के लिए ठोस कदम उठाएंगे। यदि शिप्रा नदी को वास्तव में स्वच्छ बनाया जाता है, तो यह न केवल उज्जैनवासियों के लिए बल्कि देशभर से आने वाले श्रद्धालुओं के लिए भी एक बड़ी सौगात साबित होगी। |