इंदौर । मध्यप्रदेश हाईकोर्ट की इंदौर खंडपीठ से आया एक महत्वपूर्ण आदेश प्रदेश की नगर परिषदों और नगर पालिकाओं की राजनीति में नई हलचल पैदा कर सकता है। हाईकोर्ट की डिवीजन बेंच ने स्पष्ट कर दिया है कि यदि कोई व्यक्ति वैधानिक अधिकार के बिना किसी सार्वजनिक पद पर कार्यरत होने का आरोप झेल रहा है, तो उसके खिलाफ दायर क्वो वारंटो (Quo Warranto) याचिका को केवल देरी के आधार पर खारिज नहीं किया जा सकता। इस फैसले को स्थानीय निकायों से जुड़े मामलों में दूरगामी प्रभाव वाला माना जा रहा है।
कार्यवाहक मुख्य न्यायाधीश विवेक रसिया एवं न्यायमूर्ति आनंद पाठक की डिवीजन बेंच ने रिट अपील क्रमांक 1505/2026, 2725/2026 एवं 2726/2026 की सुनवाई करते हुए पहले निरस्त की गई याचिकाओं को पुनः बहाल कर दिया। ये अपीलें नागदा नगर परिषद के अध्यक्ष अशोक मावर एवं अन्य तथा जावरा नगर परिषद अध्यक्ष रुकमन धाकड़ से जुड़े मामलों से संबंधित हैं।
अपीलकर्ताओं ने अदालत के समक्ष तर्क रखा कि मध्यप्रदेश नगरपालिका अधिनियम, 1961 की धारा-45 के तहत अध्यक्ष पद के निर्वाचन के लिए आवश्यक वैधानिक अधिसूचना जारी नहीं की गई थी। इसके बावजूद संबंधित अध्यक्ष पद पर कार्य कर रहे हैं। इस आधार पर उनके विरुद्ध क्वो वारंटो याचिकाएं दायर की गई थीं, जिन्हें एकलपीठ ने देरी का हवाला देते हुए खारिज कर दिया था।
डिवीजन बेंच ने एकलपीठ के इस दृष्टिकोण पर असहमति जताते हुए कहा कि सार्वजनिक पद की वैधानिकता का प्रश्न अत्यंत महत्वपूर्ण है और ऐसे मामलों में केवल देरी को आधार बनाकर याचिका खारिज नहीं की जा सकती। अदालत ने पहले समाप्त किए गए अंतरिम आदेश को भी पुनः प्रभावी करते हुए निर्देश दिए कि अब इन मामलों की सुनवाई तथ्यों और कानून के आधार पर की जाए।
कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि यह आदेश केवल जावरा और नागदा तक सीमित नहीं रहेगा। प्रदेश की कई नगर परिषदों और नगर पालिकाओं में ऐसे मामले लंबित हैं या पहले देरी के आधार पर समाप्त किए जा चुके हैं। अब इस निर्णय के बाद उन मामलों में भी नई कानूनी संभावनाएं पैदा हो सकती हैं और कई याचिकाकर्ता दोबारा अदालत का रुख कर सकते हैं।
हालांकि हाईकोर्ट ने अपने आदेश में किसी भी अध्यक्ष को तत्काल पद से हटाने या उनके निर्वाचन को अवैध घोषित करने का कोई अंतिम फैसला नहीं दिया है। अदालत ने केवल इतना कहा है कि याचिकाओं की सुनवाई अब मेरिट के आधार पर होगी और सभी पक्षों के तर्क सुनने के बाद अंतिम निर्णय लिया जाएगा।
हाईकोर्ट की सबसे अहम टिप्पणी रही कि यदि कोई व्यक्ति बिना वैधानिक अधिकार के किसी सार्वजनिक पद पर बना हुआ है, तो उसके विरुद्ध दायर क्वो वारंटो याचिका को केवल देरी के आधार पर खारिज नहीं किया जा सकता।
माना जा रहा है कि यह टिप्पणी भविष्य में मध्यप्रदेश के स्थानीय निकायों से जुड़े अनेक मामलों में महत्वपूर्ण कानूनी मिसाल साबित हो सकती है और प्रदेशभर की नगर परिषदों में नए सिरे से कानूनी बहस को जन्म दे सकती है।
रिपोर्टर जितेन्द्र कुमावत