सैलाना/रतलाम
रतलाम जिले के आदिवासी अंचल में पलायन अब सिर्फ एक मौसमी समस्या नहीं रहा, बल्कि यह हर साल दोहराया जाने वाला ऐसा दर्द बन चुका है जिसने गांवों की रौनक, बाजारों की चमक और गरीब परिवारों की उम्मीद तक छीन ली है। सबसे बड़ी चिंता की बात यह है कि वर्षों से यह स्थिति बनी हुई है, लेकिन आज तक ऐसा कोई स्थायी समाधान नजर नहीं आया जिससे लोगों को अपना गांव छोड़कर मजदूरी के लिए दूसरे राज्यों में भटकना न पड़े।
सैलाना, शिवगढ़, रावटी,बाजना सरवन और आसपास के आदिवासी क्षेत्रों के दर्जनों गांवों में इन दिनों सन्नाटा पसरा हुआ है। गांवों के युवा, मजदूर और कई परिवार गुजरात, राजस्थान और महाराष्ट्र की ओर पलायन कर चुके हैं। पीछे बच गए हैं सिर्फ बुजुर्ग, महिलाएं और छोटे बच्चे। गांवों में बंद पड़े मकान और सुनसान चौपालें इस बात का प्रमाण हैं कि यहां के लोगों के पास अब गांव में रुकने का कोई सहारा नहीं बचा।
ग्रामीणों का कहना है कि हर साल होली के बाद यही स्थिति बनती है। खेतों में सिंचाई की स्थायी व्यवस्था नहीं, गांवों में रोजगार नहीं, मजदूरी के अवसर नहीं और ऊपर से सामाजिक परंपराओं का बोझ। शादी-ब्याह, बीमारी और घर खर्च के लिए लोग कर्ज लेते हैं और फिर वही कर्ज उन्हें पलायन की ओर धकेल देता है। कई परिवार तो पीढ़ियों से यही जीवन जी रहे हैं।
कोरोना काल के बाद हालात और ज्यादा खराब हो गए हैं। जिले के छोटे बाजारों और कस्बों में भी व्यापार लगातार कमजोर पड़ता जा रहा है। दुकानदारों का कहना है कि दुकान किराया, भाड़ा, बिजली बिल और अन्य खर्च लगातार बढ़ रहे हैं, लेकिन बाजार में ग्राहकी नहीं है।
गांवों से लोगों के पलायन का सीधा असर स्थानीय व्यापार पर पड़ रहा है। जब गांव खाली हो रहे हैं तो बाजारों में खरीदारी कौन करेगा?
मजदूरों के पास काम नहीं, किसानों के पास पर्याप्त आमदनी नहीं और व्यापारियों के पास ग्राहक नहीं।
यही वजह है कि रतलाम जिले की ग्रामीण अर्थव्यवस्था लगातार गिरावट की ओर बढ़ती दिखाई दे रही है। कई छोटे व्यापारी अब दुकानें बंद करने की स्थिति में पहुंच गए हैं, जबकि मजदूर परिवार अपने बच्चों की पढ़ाई तक छुड़ाकर दूसरे राज्यों में मजदूरी करने मजबूर हैं।
स्थानीय लोगों का कहना है कि अगर प्रशासन गांवों में स्थायी रोजगार, सिंचाई सुविधा, छोटे उद्योग और स्थानीय स्तर पर मजदूरी के अवसर उपलब्ध कराए तो शायद लोगों को अपना घर-परिवार छोड़कर पलायन नहीं करना पड़े। लेकिन हर साल समस्याएं वही रहती हैं और गांवों से निकलती मजदूरों की भीड़ यह सवाल छोड़ जाती है कि आखिर विकास की योजनाएं जमीन पर कब उतरेंगी?
रतलाम जिले का यह पलायन अब सिर्फ मजदूरी की मजबूरी नहीं, बल्कि टूटती ग्रामीण अर्थव्यवस्था, बढ़ते कर्ज और सरकारी उदासीनता की ऐसी तस्वीर बन चुका है, जो आने वाले समय के लिए बड़ा खतरा साबित हो सकती है।
रिपोर्टर : जितेंद्र कुमावत